प्रिय अन्ना हजारे एवं सहकर्मीयों ,
पिछले लम्बे समय से हमारे काबिल नेताओं के विरुद्ध आपके द्वारा किये गए अनुष्ठान को मैंने कई अन्य लोगों की तरह देखा और कुछ सीमा तक उसमे भागीदार भी बना | किन्तु इन अब मेरे अन्तः मन में आपके लिए चंद प्रश्न बुलबुला रहे है | क्यूँ आप-हम इन बेचारे निर्गुणी नेताओं के पीछे पड़े है ? सिर्फ इस लिए की यह लोग भ्रष्टाचार करने में लिप्त है ? अरे भाई , दुनिया में इतने लोग है, हर इन्सान के पास करने को कुछ न कुछ काम तो होना चाहिए न ? कोई रिक्शा चलाता है , कोई नौकरी करता है , कोई व्यापार करता है वैसे ही हमारे नेता बेचारे " भ्रष्टाचार" करते है | अब यह भी न करे तो आप और हम ही लोग कहेंगे की हमारे नेता कामचोर है ,कुछ नहीं करते , बेचारों का तो दोनों की तरफ मरण ही हुआ ना ? अच्छा एक बात बए , आप हम लोग इतनी मेहनत करके, दिन- रात काम करके ५ पैसे कमाते है और उससे हम इन्हें "कर" दे सके ताकि इन बेचारों का पेट पल सके , इनके छोटे-मोटे स्विस बैंक के खाते भरे जा सके, इन बेचारों के बच्चे किसी गए-गुज़ारे १स्त वर्ल्ड में पढ़ सके जबकि हम आम आदमी के बड़े- बड़े PF खाते होते है, हर आम आदमी के बच्चे इतनी शान से बरगद के पेड़ के नीचे आलिशान सरकारी विधायाला में पढ़ते है , इसके सिवा और माँगा क्या इन महान सेवको ने हमसे जो हमने सर पर आसमान उठा लिया |
अच्छा चलिए माना की हमारे नेताओं ले लिए आप यह अनशन नहीं छोड़ सकते , तो ज़रा हमारे देश के (तथाकथित) बुद्धिजीवियों के लिए ही यह अनशन बंद कर दीजिये | वो लोग बेचारे वातानाकूलित कक्षों में बैठकर यह कहते है की "एक आदमी इस तरह सरकार को धमका नहीं सकत " सही कहते है वो भी , आप अकेले ही तो हो , बाकी वो १-२ लाख लोग to ऐसे ही चने खाने आते है आपके साथ, अपना सारा धंदा-पानी छोड़ कर | लेकिन इन बुद्धिजीवियों को क्या पता , यह एक बार बंद कमरे से बहार निकले तोह इन्हें पता चले | इनका यह भी कहना हिया है की अगर अन्ना को वाकई कुछ बदलाव लाना है तो वोह चुनाव में खड़े हो जाये और फिर कोई भी बिल पास करे , सच ही तो है कल को जब इन लोगों के घर बाहर कचरा जमा हो जायेगा तोह यह लोग नगर पालिका में शिकायत नहीं करेनेगे, ये सीधे नगर पालिका के चुनाव में खड़े हो होंगे क्यूंकि इन्हें कुछ बदलाव लाना होगा और वैसे भी सभी सीधे सादे , भले और निर्दोष लोग ही तो चुनाव जीतते है यह तोह हम सभी जानते है |
आपका हितेषी,
( पका ) आम आदमी
December 18, 2011
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good one. I liked the sarcasm :)
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